जय भोलेनाथ! सनातन हिंदू धर्म में शिव उपासना का अत्यंत दिव्य और चमत्कारी महत्व है। देवों के देव महादेव को प्रसन्न करने के लिए वैसे तो अनेक मंत्र और स्तोत्र मौजूद हैं, परंतु सरल और सहज भाषा में रचित श्री शिव चालीसा (Shri Shiv Chalisa) का पाठ हर भक्त के हृदय में विशेष स्थान रखता है। शिव चालीसा चालीस अत्यंत प्रभावशाली चौपाइयों और दोहों का एक पवित्र संग्रह है, जिसके माध्यम से भगवान शिव के कल्याणकारी स्वरूप, उनकी अद्भुत लीलाओं और उनकी अपार महिमा का गुणगान किया गया है।

इस पावन चालीसा की रचना परम शिव भक्त श्री अयोध्यादास जी ने की थी। उन्होंने बहुत ही सुंदर और सरल अवधी भाषा में भोलेनाथ की स्तुति को पिरोया है, ताकि साधारण से साधारण मनुष्य भी इसका उच्चारण कर भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त कर सके। चालीसा शब्द मूल रूप से 'चालीस' संख्या से आया है, क्योंकि इसमें ठीक चालीस छंदों (चौपाइयों) के माध्यम से प्रभु की वंदना की जाती है।

शास्त्रों और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शिव चालीसा का पाठ करने के लिए प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकाल का समय सर्वोत्तम माना गया है। विशेष रूप से सोमवार का दिन भगवान शिव की आराधना के लिए समर्पित होने के कारण इस दिन पाठ करने से अनंत गुणा फल की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त, श्रावण मास (सावन के सोमवार), महाशिवरात्रि, और प्रदोष व्रत के पावन पर्वों पर किया गया पाठ जीवन की दिशा बदल सकता है।

नियमित रूप से शिव चालीसा का गान करने से साधक के जीवन से सभी प्रकार का भय, मानसिक तनाव, और नकारात्मक ऊर्जा (Negativity) पूरी तरह समाप्त हो जाती है। यह पवित्र पाठ अकाल मृत्यु के भय को दूर करता है, गंभीर रोगों से मुक्ति दिलाता है, और कुंडली में मौजूद नवग्रहों के अशुभ प्रभाव (विशेषकर शनि और राहु-केतु दोष) को शांत करने में अचूक माना गया है। जो भक्त पूरी श्रद्धा, पवित्रता और सच्चे मन से इसका पाठ करते हैं या एकाग्र होकर सुनते हैं, उनके घर में हमेशा सुख, शांति और अखंड समृद्धि का वास रहता है।

भावार्थ सहित सम्पूर्ण पाठ

श्री शिव चालीसा भगवान शिव फोटो
॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
भावार्थ: माता पार्वती के पुत्र, कल्याण के मूल और परम ज्ञानी श्री गणेश जी की जय हो। अयोध्यादास आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप मुझे निर्भय होने का वरदान दें।

जय गिरिजाय पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥

भावार्थ: हे दीनों पर दया करने वाले माता पार्वती के प्राणनाथ! आपकी जय हो। आप सदा संतों का पालन करते हैं। आपके मस्तक पर सुन्दर चन्द्रमा और कानों में नाग के कुंडल सुशोभित हैं।

अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥

भावार्थ: आपके गोरे शरीर और जटाओं में गंगा बहती है, गले में मुंडमाल है और शरीर पर भस्म लगी है। आपने बाघ की खाल धारण की हुई है, आपकी इस मनमोहक छवि को देखकर नाग और मुनि भी मोहित हो जाते हैं।

मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

भावार्थ: मैनावती की दुलारी माता पार्वती आपके वाम अंग में अत्यंत सुन्दर लग रही हैं। आपके हाथों में त्रिशूल सुशोभित है, जिससे आप सदा शत्रुओं का नाश करते हैं।

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥

भावार्थ: आपके दरबार में नंदी और श्री गणेश ऐसे शोभा दे रहे हैं जैसे सागर के बीच कमल खिले हों। भगवान कार्तिकेय और गणों के स्वामी की इस अनुपम छवि का वर्णन कोई नहीं कर सकता।

देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

भावार्थ: हे प्रभु! जब-जब देवताओं ने आपको पुकारा, तब-तब आपने उनके दुखों का निवारण किया। जब तारकासुर ने भारी उपद्रव मचाया, तब सभी देवताओं ने मिलकर आपसे प्रार्थना की।

तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

भावार्थ: तब आपने तुरंत षडानन को भेजा और उन्होंने पलक झपकते ही उस असुर को मार गिराया। आपने ही जलंधर नामक राक्षस का संहार किया था, आपका यह सुयश पूरे संसार में विख्यात है।

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥

भावार्थ: आपने त्रिपुरासुर के साथ महायुद्ध करके देवताओं पर कृपा की और उन्हें बचाया। हे पुरारी! जब भगीरथ ने घोर तपस्या की, तो आपने उनकी प्रतिज्ञा भी पूरी की।

दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

भावार्थ: हे महादेव! दानियों में आपके समान कोई नहीं है, आपके सेवक सदा आपकी स्तुति करते हैं। वेदों ने भी आपकी महिमा गाई है, आप अकथ और अनादि हैं, जिसका भेद कोई नहीं पा सका।

प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥

भावार्थ: जब समुद्र मंथन से भयंकर हलाहल विष प्रकट हुआ और सभी देव-दानव जलने लगे, तब आपने ही दया करके उस विष को पी लिया और आप नीलकंठ कहलाए।

पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥

भावार्थ: जब भगवान श्रीराम ने आपकी पूजा की, तो लंका जीतकर विभीषण को दे दी। जब श्रीराम एक हज़ार कमल चढ़ा रहे थे, तब हे पुरारी! आपने उनकी परीक्षा लेने के लिए एक कमल छिपा लिया।

एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

भावार्थ: जब आपने एक कमल छिपा लिया, तो कमलनयन श्रीराम ने अपना नेत्र ही अर्पित करना चाहा। उनकी ऐसी कठिन भक्ति देखकर आपने प्रसन्न होकर उन्हें इच्छित वरदान दिया।

जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥

भावार्थ: हे अनंत और अविनाशी प्रभु! आपकी जय हो, आप सबके हृदय में वास करते हुए कृपा करते हैं। मुझे सांसारिक विकार रूपी दुष्ट सदा सताते हैं, जिससे चैन नहीं मिलता।

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥

भावार्थ: हे नाथ! मैं त्राहि-त्राहि पुकार रहा हूँ, इस कठिन अवसर पर आकर मेरा उद्धार कीजिए। अपना त्रिशूल लेकर इन विकारों रूपी शत्रुओं का नाश कर दीजिए और संकट से बचाइए।

मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥

भावार्थ: हे प्रभु! इस सांसारिक संकट में कोई सच्चा साथ नहीं देता। हे स्वामी! अब केवल आपकी ही आस है, आप आकर मेरे इन भारी संकटों को हर लीजिए।

धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥

भावार्थ: आप निर्धन को सदा धन देते हैं, जो भी आपसे जो मांगता है, वह फल पाता है। मैं किस विधि से आपकी स्तुति करूँ? हे नाथ! मेरी सभी भूलों को क्षमा करें।

शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं॥

भावार्थ: हे शिवशंकर! आप संकटों का नाश करने वाले, मंगल करने वाले और विघ्नों को हरने वाले हैं। योगी, मुनि आपका ध्यान लगाते हैं और देवर्षि नारद तथा माता सरस्वती भी आपके सामने शीश झुकाते हैं।

नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शम्भु सहाई॥

भावार्थ: हे भगवान शिव! आपको बार-बार नमस्कार है, ब्रह्मा आदि देवता भी आपका पार नहीं पा सके। जो भी व्यक्ति मन लगाकर इस शिव चालीसा का पाठ करता है, शम्भु उसकी सहायता करते हैं।

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥

भावार्थ: जो कोई कर्जे से दबा हो, वह यदि इसका पाठ करे तो ऋण मुक्त हो जाता है। यदि कोई संतान की कामना करे, শিব जी की कृपा से उसे अवश्य फल प्राप्त होता है।

पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥
त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥

भावार्थ: जो त्रयोदशी के दिन ध्यानपूर्वक हवन कराता है और त्रयोदशी का व्रत रखता है, उसके शरीर और जीवन में कभी कोई कष्ट या क्लेश नहीं रहता।

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥

भावार्थ: जो शिवजी को धूप, दीप और नैवेद्य चढ़ाकर उनके सम्मुख इस चालीसा का पाठ सुनाता है, उसके जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत में वह शिवलोक को प्राप्त करता है।

कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

भावार्थ: अयोध्यादास जी कहते हैं कि हे प्रभु! मुझे केवल आपकी ही आस है। मेरी स्थिति जानकर मेरे सभी दुखों को हर लीजिए।
॥ दोहा ॥
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥
भावार्थ: हे जगदीश्वर! मैं रोज नियमपूर्वक सुबह उठकर इस चालीसा का पाठ करूँ और आप मेरी सभी मनोकामनाएं पूरी करें। मार्गशीर्ष मास की षष्ठी तिथि, हेमंत ऋतु और संवत चौसठ में यह कल्याणकारी शिव चालीसा पूरी हुई।