जय भोलेनाथ! सनातन धर्म में शिव आराधना का विशेष महत्व है और किसी भी पूजा या व्रत का समापन भगवान शिव की आरती के बिना अधूरा माना जाता है। 'ॐ जय शिव ओंकारा' (Om Jai Shiv Omkara) महादेव की सबसे प्राचीन और सिद्ध आरती है। शास्त्रों के अनुसार, इस आरती का नियमित गान करने से मनुष्य के सभी सांसारिक कष्ट दूर होते हैं और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। पाठकों की सुविधा के लिए हमने यहाँ गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रमाणित शुद्ध पंक्तियाँ और उनका सरल हिंदी अर्थ प्रस्तुत किया है।

॥ श्री शिव आरती अर्थ सहित ॥

भगवान शिव आरती - Om Jai Shiv Omkara Aarti
देवों के देव महादेव - अर्द्धांगी धरा शिव शंभू

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा ॥

भावार्थ: हे परमात्मा शिव! आपकी जय हो। हे स्वामी! आपकी जय हो। ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव—ये तीनों आपके ही रूप हैं और माता पार्वती आपके वाम अंग (शरीर के आधे भाग) में सदा सुशोभित रहती हैं।

एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥

भावार्थ: महादेव! आपकी महिमा अद्भुत है। आप एक मुख वाले, चार मुख वाले (ब्रह्मा रूप) और पाँच मुख वाले रूप में भी सुशोभित हैं। जहाँ ब्रह्मा जी का वाहन हंस और विष्णु जी का वाहन गरुड़ है, वहीं आपका वाहन नंदी (बैल) आपके दरबार की शोभा बढ़ाता है।

दो भुज चारु चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखता त्रिभुवन जन mohe ॥

भावार्थ: हे भोलेनाथ! आपकी दो, चार और दस भुजाओं वाले अत्यंत दिव्य रूप बहुत सुंदर लगते हैं। आपके इस सत, रज और तम—तीनों गुणों से युक्त त्रिगुण स्वरूप को देखकर तीनों लोकों के समस्त जीव और मनुष्य मोहित हो जाते हैं।

अक्षमाला बनमाला मुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी ॥

भावार्थ: आप अपने गले में रुद्राक्ष की माला, फूलों की वनमाला और मुंडों (खोपरियों) की माला धारण करते हैं। आपके मस्तक पर सुगंधित चंदन और कस्तूरी का तिलक लगा है, और आपके भाल (मस्तक) पर स्वयं चंद्रमा विराजमान हैं।

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥

भावार्थ: हे प्रभु! आप श्वेताम्बर (सफेद वस्त्र), पीताम्बर (पीले वस्त्र) और बाघम्बर (बाघ की खाल) धारण करते हैं। आपके साथ एक तरफ सनकादि मुनि और गंधर्व रहते हैं, तो दूसरी तरफ भूत-प्रेत और गण भी आपकी सेवा में सदैव साथ रहते हैं।

कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धरता।
जगकर्ता जगभर्ता जगपालनकर्ता ॥

भावार्थ: आपके हाथों में दिव्य कमंडलु, सुदर्शन चक्र और पवित्र त्रिशूल सुशोभित हैं। आप ही इस संपूर्ण संसार को उत्पन्न करने वाले (कर्ता), इसका भरण-पोषण करने वाले (भर्ता) और इसका पालन-रक्षण करने वाले सर्वशक्तिमान हैं।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका ॥

भावार्थ: अज्ञानी मनुष्य ब्रह्मा, विष्णु और शिव को अलग-अलग मानते हैं, लेकिन विवेकशील जानते हैं कि महामंत्र 'ॐ' (प्रणव) के अक्षरों (अ, उ, म) के भीतर ये तीनों शक्तियां मिलकर वास्तव में एक ही हैं।

काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी।
नत उठि दर्शन पावत महिमा अति भारी ॥

भावार्थ: पवित्र नगरी काशी में आप स्वयं बाबा विश्वनाथ के रूप में विराजमान हैं और आपके सम्मुख परम ब्रह्मचारी श्री नंदी जी स्थित हैं। जो भी भक्त नित्य सुबह उठकर आपके दर्शन करता है, उसे आपकी महान कृपा और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवाञ्छित फल पावे ॥

भावार्थ: स्वामी शिवानंद जी कहते हैं कि जो भी मनुष्य भगवान शिव की इस त्रिगुणमयी आरती का भक्तिपूर्वक गान करता है, शिवजी की अनुकंपा से उसके जीवन के सभी संकट नष्ट हो जाते हैं और उसे मनवांछित फल (सुख-समृद्धि और अंत में मोक्ष) प्राप्त होता है।